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मन के पंख नहीं होते पर

>> Friday, July 25, 2008


मन के पंख नहीं होते पर
फिर भी मन उड़ जाता है
व्याकुल पंखों को फैलाकर
नील गगन में जाता है
कभी दिखाता सुन्दर सपने
उर उम्मीद जगाता है
घोर निशा के तिमिरांचल में
सूर्य किरण बिखराता है ।

असफ़लता की घोर निराशा
जीवन में जब आती है
विगत सुःखों की झिलमिल झाँकी
आँखों में तिर जाती है
देखे थे जो सुन्दर सपने
उनकी याद सताती है।
चिर वियोग की तीव्र वेदना
आँखों में तिर जाती है

यह पागल सा हो मतवाला
तृष्णा- जाल बिछाता है
अपने पंखों संग बाँधकर
दूर बहुत ले जाता है
देख नयन का सुन्दर उत्सव
हृदय- हर्षित हो जाता है
तभी अचानक क्रूर सत्य भी
हँसी छीन ले जाता है

कभी सोचती त्वरित गति से
पिंजर एक बनाउँ मैं
चंचल गति को इसकी रोकूँ
अपना दास बनाऊँ मैं
किन्तु हृदय से ध्वनि ये आती
मन को लाड़- लड़ाऊँ मैं
भूल सत्य को इसके संग ही
उन्मत्त दौड़ लगाऊँ मैं

14 comments:

अशोक पाण्डेय July 25, 2008 at 6:20 PM  

आपकी कविताएं भी घोर निशा के तिमिरांचल में सूर्य किरण बिखरानेवाली होती हैं।

बाल किशन July 25, 2008 at 6:32 PM  

निराशा से लड़ने की प्रेरणा तो देती ही है ये कविता पर इसके साथ-साथ मन पखेरू की आजादी का और इस आजादी के साथ जुड़ने का सुखद अहसास भी करवाती है.
दिल को छू लेने वाली बेहद ही सुंदर और प्यारी रचना.

कुश एक खूबसूरत ख्याल July 25, 2008 at 7:58 PM  

बहुत ही सुंदर..

उन्मत्त दौड़ लगाऊँ मैं
कितनी सुंदर पंक्ति है ये है.. अपने आप में बहुत कुछ समेटे..

vipinkizindagi July 25, 2008 at 7:59 PM  

मन के पंख नहीं होते पर
फिर भी मन उड़ जाता है

बहुत सही ....
अच्छी है ....

मोहन वशिष्‍ठ July 25, 2008 at 8:04 PM  

वाह शोभा जी बहुत अच्‍छे ढंग से मन को परिभाषित किया हे आपने बधाई हो

राज भाटिय़ा July 25, 2008 at 8:06 PM  

असफ़लता की घोर निराशा
जीवन में जब आती है
विगत सुःखों की झिलमिल झाँकी
आँखों में तिर जाती है
वाह कया बात हे, धन्यवाद

रंजना [रंजू भाटिया] July 25, 2008 at 8:39 PM  

behad aashawaadi kavita likhi hai aapne shobha ji bahut pasand aayi yah

रंजना [रंजू भाटिया] July 25, 2008 at 8:39 PM  
This comment has been removed by the author.
अनुराग July 26, 2008 at 12:00 PM  

कभी सोचती त्वरित गति से
पिंजर एक बनाउँ मैं
चंचल गति को इसकी रोकूँ
अपना दास बनाऊँ मैं
किन्तु हृदय से ध्वनि ये आती
मन को लाड़- लड़ाऊँ मैं
भूल सत्य को इसके संग ही
उन्मत्त दौड़ लगाऊँ मैं


बहुत सुंदर कविता......कभी ऐसा ही कुछ लिखा था ......
बाँध के रखो इन ख्यालो को
कम्बखत आसमान तक उडान भरते है

नीरज गोस्वामी July 26, 2008 at 12:48 PM  

शोभा जी
कभी दिखाता सुन्दर सपने
उर उम्मीद जगाता है
घोर निशा के तिमिरांचल में
सूर्य किरण बिखराता है ।
वाह...बहुत सावधानी से शब्दों का चयन किया है आपने और "मन" पर ये बेजोड़ रचना लिखी है. शब्द शब्द मन के भाव और प्रकृति को दर्शाता है...इस विलक्षण रचना के लिए आप को साधुवाद....
नीरज

arvind mishra July 27, 2008 at 7:31 AM  

मन को छूती सुंदर कविता -अतीत हमेशा बेहतर होता है .......

Pramod Kumar Kush ''tanha" July 27, 2008 at 11:48 AM  

sunder kavita sunder bhaav..pasand aayee...

Rajesh July 30, 2008 at 11:05 AM  

कभी सोचती त्वरित गति से
पिंजर एक बनाउँ मैं
चंचल गति को इसकी रोकूँ
अपना दास बनाऊँ मैं
Shobhaji, Mann ki chanchal gati ko rok pana asaan hi nahi, na-mumkin hi hai, chahe aap koi pinjda bana kar use us main kaid kar ke dekh lijiye, wah hamesa se hi azad raha hai aur azad hi rahega, use aap apna dass nahi bana sakte....
Mann ke uper ek ati sunder rachna hai yah.

सतीश सक्सेना August 12, 2008 at 8:23 PM  

मुझे दुःख है की आपको काफी दिन से पढ़ नहीं पाया !अतः इतना सुंदर गीत से वंचित रहा...
"मन के पंख नहीं होते पर
फिर भी मन उड़ जाता है
व्याकुल पंखों को फैलाकर
नील गगन में जाता है...."
इस कविता में आपने बेहतरीन शब्द्चित्रण दिया है !

बड़ी गहरी यादें... लगता है बोल पड़ेंगी ! आपकी इस तन्मयता को प्रणाम !

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