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कभी-कभी

>> Tuesday, May 20, 2008


कभी-कभी सब कुछ

अच्छा क्यों लगने लगता है ?

बिना कारण कोई

सच्चा क्यों लगने लगता है ?

क्यों लगता है कि

कुछ मिल गया ?

अँधेरे में जैसे चिराग जल गया ?

हवाओं की छुवन

इतनी मधुर क्यों लगने लगती है ?

पक्षी की चहचहाहट

क्यों मन हरने लगती है ?

मन के आकाश में

रंग कहाँ से आ जाते हैं ?

किसी के अंदाज़

क्यों इतना भा जाते हैं ?

भीनी-भीनी खुशबू

कहाँ से आजाती है ?

और चुपके से

हर ओर बिखर जाती है ?

ना जाने कौन

कानों में चुपके से

कुछ कह जाता है ।

जिसे सुनकर-

मेरा रोम-रोम

मुसकुराता है ।

 

16 comments:

रंजू ranju May 20, 2008 at 3:38 PM  

सुंदर रचना है शोभा जी

राजीव रंजन प्रसाद May 20, 2008 at 3:42 PM  

ना जाने कौन
कानों में चुपके से
कुछ कह जाता है ।
जिसे सुनकर-
मेरा रोम-रोम
मुसकुराता है

वाह!!!

***राजीव रंजन प्रसाद

नीरज गोस्वामी May 20, 2008 at 4:38 PM  

शोभा जी
बहुत सुंदर शब्द और उतने ही सुंदर भाव....वाह बहुत खूब.
नीरज

mehek May 20, 2008 at 4:40 PM  

bahut hi khubsurat badhai

kmuskan May 20, 2008 at 4:44 PM  

ना जाने कौन
कानों में चुपके से
कुछ कह जाता है ।
जिसे सुनकर-
मेरा रोम-रोम
मुसकुराता है ।

bahut khoobsurat panktiya hai

DUSHYANT May 20, 2008 at 6:03 PM  

man khush huaa apke blog par aaakar,likhen,likhtee rahen

DR.ANURAG ARYA May 20, 2008 at 6:54 PM  

आपका ये जुदा अंदाज भी खूब है....

Udan Tashtari May 20, 2008 at 9:37 PM  

कविता बहुत अच्छी लगती है कभी कभी!! :)

बेहतरीन!

pallavi trivedi May 21, 2008 at 12:19 AM  

वाह...बहुत प्यारी कविता.! सभी के साथ ऐसा होता है...

कामोद Kaamod May 21, 2008 at 2:14 AM  

वाह, वाह, वाह ....

अशोक पाण्डेय May 21, 2008 at 9:09 AM  

शोभा जी,
आप की कवितायें मन को छूनेवाली हैं.
जितने सुंदर व सकारात्मक भाव, उतनी ही तरल व पारदर्शी भाषा.
सारी कवितायें पाठकीय संवेदना को जगाती हैं. आगे भी पढूंगा.

मोहिन्दर कुमार May 21, 2008 at 5:11 PM  

शोभा जी,

सुन्दर प्रीत भरी रचना है.

खुशी या गम दोनों ही मन की भावनायें हैं... वक्त और परिस्थितियों के साथ बदलती है..प्रीत का मौसम बना रहे तो किसी और क्या चाहिये.

शोभा May 21, 2008 at 8:55 PM  

सभी मित्रों का बहुत-बहुत धन्यवाद। आपके प्रोत्साहन से लिखने और पढ़ने का उत्साह बढ़ गया है। बस इसी तरह उत्साह बढ़ाते रहें। सस्नेह

योगेन्द्र मौदगिल May 21, 2008 at 9:41 PM  

sundar, ati sundar
aapki lekhni anavrat chalti rahe, inhi shubhkamnaon ke saath

Rajesh May 23, 2008 at 3:52 PM  

Nice poem Shobhaji,
Jab mann bahot hi khush ho jata hai jis waqt tabhi yah anubhuti mehsoos kar pate hain ya phir....
... Jab pyaar kisi se hota hai.... ab aap soch lijiye. Lekin jaisi ki maine pahle bhi likha hai, aap ki likhaai ke her pahloo mein jaan hoti hai........

Suresh Chandra Gupta May 28, 2008 at 9:36 AM  

जब प्रेम आता है जीवन में तो कैसा अनुभव होता है? अति सुंदर वर्णन किया है आपने.

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