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हम और तुम

>> Saturday, November 17, 2007



हम और तुम
सदैव एक दूसरे
की ओर आकर्षित
कभी तृप्त,कभी अतृप्त
कभी आकुल,कभी व्याकुल
किसी अनजानी कामना से
बढ़ते जा रहे हैं ----

मिल जाएँ तो विरक्त
ना मिल पाएँ तो अतृप्त
कभी रूष्ट, कभी सन्तुष्ट
कामनाओं के भँवर में
उलझते जा रहे हैं --

सामाजिक बन्धनों से त्रस्त
मर्यादा की दीवारों में कैद
सीमाओं से असन्तुष्ट
स्वयं से भी रूष्ट
दुःख पा रहे हैं --

निज से भी अनुत्तरित
विचारों से परिष्कृत
हृदय से उदार
भीतर से तार-तार
कहाँ जा रहे हैं ?

चलो चलें कहीं दूर
जहाँ हो उसका नूर
निःशेष हो हर कामना
कभी ना पड़े भागना
सारे द्वन्द्व जा रहे हैं--
मन वृन्दावन हो जाए
वो ही वो रह जाए
सारा संशय बह जाए
बस यही ध्वनि आए
सुःख आ रहे हैं --

3 comments:

Mired Mirage November 18, 2007 at 9:48 PM  

सुन्दर कविता !
घुघूती बासूती

Rajesh November 21, 2007 at 2:52 PM  

Shobhaji, yahi to maanav mann ki vidambanaen. Hamesha bhatakta hi rahta hai, atrupt atma ki tarah, kabhi bhi kahin bhi chain nahi milta use. aur yah jo aap kah rahe hai -
चलो चलें कहीं दूर
जहाँ हो उसका नूर
निःशेष हो हर कामना
कभी ना पड़े भागना
सारे द्वन्द्व जा रहे हैं-- मन वृन्दावन हो जाए
वो ही वो रह जाए
सारा संशय बह जाए
main kahoonga ki jis udesh se aap bhagna chahte hai, shayad vrindavan ke krishna ki aur, to WOH to har jagah vyapt hi hai, takleef yahi hai ki hum use dekh nahi pate aur yahan wahan bhatakte rahte hai usi ko dhoondhte hue.
anyways, good article

Dr. RAMJI GIRI November 26, 2007 at 8:36 PM  

चलो चलें कहीं दूर
जहाँ हो उसका नूर
निःशेष हो हर कामना
कभी ना पड़े भागना
सारे द्वन्द्व जा रहे हैं-- मन वृन्दावन हो जाए
pretty good depiction of evolution of love from worldy1 2 bliss.good poetry.

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