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त्योहारों का मौसम

>> Tuesday, November 6, 2007


लो आगया फिर से
त्योहारों का मौसम
उनके लूटने का
हमारे लुट जाने का मौसम
बाजारों में रौशनी
चकाचौंध करने लगी है
अकिंचनो की पीड़ा
फिर बढ़ने लगी है
धनी का उत्साह
और निर्धन की आह
सभी ढ़ूँढ़ रहे हैं
खुशियों की राह
व्यापारी की आँखों में
हज़ारों सपने हैं
ग्राहकों को लूटने के
सबके ढ़ग अपने हैं
कोई सेल के नाम पर
कोई उपहार के नाम पर
कोई धर्म के नाम पर
आकर्षण जाल बिछा रहा है
और बेचारा मध्यम वर्ग
उसमें कसमसा रहा है
उसका धर्म और आस्था
खर्च करने को उकसाते हैं
किन्तु जेब में हाथ डालें तो
आसूँ निकल आते हैं ।
सजी हुई दुकानें
और जगमगाते मकान
उसे मुँह चिढ़ाते हैं
सोचने लगती हूँ मैं
ये त्योहार क्यूँ आते हैं ?

4 comments:

बाल किशन November 6, 2007 at 6:36 PM  

"धनी का उत्साह
और निर्धन की आह
सभी ढ़ूँढ़ रहे हैं
खुशियों की राह"
लिखा तो जी आपने बहुत अच्छा है लेकिन जी आपसे मेरी सिर्फ़ यही शिकायत है कि आप त्योहारों से इतनी शिकायत ना रखें. त्यौहार है तो जिन्दगी मे रंग,सुर और खुशबू है.

Sanjeet Tripathi November 6, 2007 at 9:51 PM  

सही!! पर यह त्योहार ही तो है जो हमारे रोजमर्रा की चिड़चिड़ाहट और ऊब के बाद भी ज़िंदगी में एक नयापन , एक नया उत्साह ला जाते हैं

Udan Tashtari November 6, 2007 at 11:47 PM  

बाल किशन जी और संजीत जी की बात ही दोहराना चाहता हूँ. यूँ रचना सुन्दर है.

Rajesh November 12, 2007 at 1:55 PM  

Namaskar Shobhaji,
Vaise to aap ki baat mein kuchh dum hai lekin kya kare, ab yahi is jeevan ka ek sachha pahloo hai. Bus humen inhi sab ko apna kar yahin per tyoharon ko manana hai. Sukh sirf ek baat hai ki kuchh samay ke liye, gareeb aur tavangar sabhi log apne apne tarike se tyoharon ki khushiyan manane lag jate hai.........
Bus aap bhi inhi mein jut jaiye....

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