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लोक तंत्र

>> Saturday, January 12, 2008


मैं लोकतंत्र हूँ--
भारत का संविधान
मेरा ही अनुगमन करता है
क्योंकि--
मैं जनता के लिए
जनता के द्वारा
और जनता का तंत्र हूँ
फिर भी--
जन सामान्य यहाँ
कुचला जाता है
तोहमत मुझपर लगती है
मैं जन-जन को
अधिकार देता हूँ
राष्ट्र निर्माण का अधिकार
अपना प्रतिनिधि
चुनने का अधिकार
किन्तु देश की जनता
इससे उदासीन रहती है
मतदान के दिन
चैन से सोती है
देश में हो रहा चुनाव
छट्टी का दिन
बन जाता है
इसीलिए उसका
भरपूर आनन्द उठाता है
केवल कुछ लोग
मतदान को जाते हैं
पर साम्प्रदायिकता से
ऊपर नहीं उठ पाते हैं
कभी धर्म के नाम पर
कभी जाति के नाम पर
और कभी लालच में
मतदान कर आते हैं
इसलिए धूर्त लोग
इसका लाभ उठाते हैं
मनचाहा मतदान करवा
शासक बन जाते हैं
सीना छलनी कर जाते हैं
कभी-कभी सोचता हूँ
मुझे सफल बनाना
जन सामान्य का काम है
फिर --
मेरा नाम क्यों बदनाम है?
देश का हर नागरिक
अपनी ही चिन्ता में डूबा है
देश और देशभक्ति
सबके लिए अजूबा है
संविधान से लोग
उम्मीद तो लगाते हैं
पर देश के लिए
समय नहीं निकाल पाते हैं
मेरे ५८वेँ जन्म दिवस पर
एक उपहार दे जाओ
इस वर्ष मुझे सच- मुच
जनतंत्र बना जाओ
जन-जन का तंत्र
बना जाओ----

5 comments:

रंजू January 12, 2008 at 5:23 PM  

संविधान से लोग
उम्मीद तो लगाते हैं
पर देश के लिए
समय नहीं निकाल पाते हैं
मेरे ५८वेँ जन्म दिवस पर
एक उपहार दे जाओ
इस वर्ष मुझे सच- मुच
जनतंत्र बना जाओ
जन-जन का तंत्र
बना जाओ----

सुंदर .उपहार दे सके और सच कर सके हर बात को यही दुआ है ..सुंदर कविता है बधाई !!

महेंद्र मिश्रा January 12, 2008 at 7:18 PM  

आपने कविता मे लोकतंत्र के दर्द को बढ़िया ढंग से उकेरा है .बहुत बढ़िया कविता बधाई

Rajesh January 15, 2008 at 2:24 PM  

संविधान से लोग
उम्मीद तो लगाते हैं
पर देश के लिए
समय नहीं निकाल पाते हैं
मेरे ५८वेँ जन्म दिवस पर
एक उपहार दे जाओ
इस वर्ष मुझे सच- मुच
जनतंत्र बना जाओ
जन-जन का तंत्र
बना जाओ----
Shobhaji, badi sachhi aur kadvi baat kahi hai aapne LOKTANTRA ke baare mein. Agar aapki yah baat poore Bharatvarsh mein fail jaye to hi sahi maine mein LOKTANTRA ki Vijay hogi. Aur agar humein 21st century mein jana hai to aisa hi kuchh kar dikhana hai. In dhurt, lalchi netaon ko LOK hi paath padha sakte hai.....
५८वेँ जन्म दिवस पर aapko badhaai ki itni sunder rachna bana payii.
Vande Matarammm!

प्रभाकर पाण्डेय January 19, 2008 at 10:21 PM  

पहली बार पढ़ रहा हूँ आपको। बहुत ही बढ़िया लिखती हैं आप। साधुवाद।

pammy April 26, 2009 at 12:12 PM  

kya kavita haii !!!!! wow!!bahut hi accha likha aapne

ek doubt hai loktantra par koi slogan hota haii????

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