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आओ एक इतिहास बनाएँ

>> Monday, January 7, 2008


आओ एक इतिहास बनाएँ
वैर भाव से त्रस्त हृदयों को
शीतल चन्दन लेप लगाएँ

सदियों तक तड़पी मानवता
धर्म जाति की अग्नि में
मन्दिर-मस्ज़िद के झगड़ों से
छलनी हैं सबके सीने
आओ मिलकर कोशिश कर लें
सच्चा एक इन्सान बनाएँ
फिर शंकर को आज ले आएँ
सच्चा मानव धर्म सिखाएँ

पश्चिम ने पूरब को घेरा
जीत रही है भौतिकता
धन के पीछे भाग रहे हैं
धक्के खाती नैतिकता
आओ अपने बच्चों को फिर
पूरब का आदर्श दिखाएँ
विवेकानन्द को फिर ले आएँ
भारत की फिर शान बढ़ाएँ
उसको विश्व विजयी बनाएँ

देश प्रेम की झूठी चर्चा
संसद में नेता करते हैं
लूट देश को जेबें भरते
बड़ी-बड़ी ये बातें करते
आओ इनके षड़यंत्रों को
हम सब मिलकर विफल बनाएँ
भगत सिंह के फिर ले आएँ
मिलकर अपना राष्ट्र बचाएँ


गीली मिट्टी हाथ हमारे
पूरे कर लें सपने सारे
सद्भावों का रंग ले आएँ
देश भक्ति का जल बरसाएँ
अदभुत् सुन्दर मूर्ति बनाएँ
भारत माता के चरणों में
अपनी अनुपम भेंट चढ़ाएँ
अपना गुरुत्तर भार निभाएँ
आओ एक इतिहास बनाएँ

8 comments:

Rajesh January 7, 2008 at 4:04 PM  

वैर भाव से त्रस्त हृदयों को
शीतल चन्दन लेप लगाएँ
bahut hi sunder kalpana hai yah. Jaise hi aap bata rahi hai, neta logon ka to yahi kaam aur dharm hai logon ko uksate rahna aur unko aapas mein bhida dena. Lekin ek umeed hoti hai, aap logon se jo teachers hai, aur jo hamare des ke bachhon ka bhavishya banate hai. Agar sabhi teachers aap ke jaise des bhakt ho jaye aur sabhi ke mann mein yah paschimi bhautikta dansne lage tabhi yah karya purna ho sakta hai. Haan sabhi des vasiyon ka sahyog bhi ekdam se jaroori hi hai.
गीली मिट्टी हाथ हमारे
पूरे कर लें सपने सारे
सद्भावों का रंग ले आएँ
देश भक्ति का जल बरसाएँ
अदभुत् सुन्दर मूर्ति बनाएँ
भारत माता के चरणों में
अपनी अनुपम भेंट चढ़ाएँ
अपना गुरुत्तर भार निभाएँ
आओ एक इतिहास बनाएँ
yahi murty ki tati jaroorat hai aur isi ke samne nat mastak rah kar hum sab yahi vacan le, tabhi yah sab ho payega
bahut achhi rachna hai, desh bhakti ki yah, naya saal ka naya resolution......

नीरज गोस्वामी January 7, 2008 at 6:20 PM  

धन के पीछे भाग रहे हैं
धक्के खाती नैतिकता
आओ अपने बच्चों को फिर
पूरब का आदर्श दिखाएँ
बहुत खूब शोभा जी...वाह...कितनी अच्छी बात लिखी है आपने, अगर हर कोई ये बात मान ले तो शायद इस देश का मुकाबला फ़िर कोई दूसरा देश कर ही ना पाये...बच्चे के पैदा होते ही उसको क ख ग की जगह अ बी क सिखा कर गर्व महसूस करते हैं याने गुलामी के सूत्र उसे बचपन में ही पकड़ा देते हैं....
नीरज

नीरज गोस्वामी January 7, 2008 at 6:21 PM  

बच्चे के पैदा होते ही उसको क ख ग की जगह A B C सिखा कर गर्व महसूस करते हैं

मीत January 7, 2008 at 6:46 PM  

बहुत खूब शोभा जी. कितना अच्छा सपना है. कितने अच्छे भाव. काश ......
बहुत अच्छा लगा पढ़ कर. बधाई.

shobha January 7, 2008 at 8:09 PM  

राजेश जी, नीरज जी एवं मीत जी
आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। आप इसी तरह उत्साह बढ़ाते रहें ।

जेपी नारायण January 8, 2008 at 2:39 AM  

इतना सब सिखा के क्या करिएगा, इंसानियत की जड़ों में रोजाना मट्ठे का समंदर उड़ेला जा रहा है। उस समंदर के वारिस जानवरों को पहचानिए, पूरब-पश्चिम का भेद समझ में आ जाएगा। कविता में मध्यमवर्गीय भावुकता ने खूब जोर मारा है।

shobha January 8, 2008 at 3:32 PM  

जे पी नारायण जी
आपकी बात एकदम सही है । एक नया उत्साह जगाने के लिए शुक्रिया

रंजू January 12, 2008 at 5:20 PM  

बहुत सही कहा है आपने शोभा जी ....

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