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मेरी कविता मेरी आवाज mai

>> Tuesday, October 2, 2007

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3 comments:

Udan Tashtari October 3, 2007 at 7:15 AM  

सही है कभी कभी अपने भी अजनबी हो जाते हैं..बहुत खूब.

सागर चन्द नाहर October 3, 2007 at 5:13 PM  

बहुत ही बढ़िया कविता है और उतनी ही अच्छी आपकी आवाज भी|
बधाई

Neeraj Goswamy October 14, 2007 at 7:12 PM  

अत्यन्त सधी आवाज़ मैं उतनी ही सधी हुई रचना.ये पीड़ा हर समाजिक प्राणी भोगता ही है.आप ने शाश्वत सत्य को उजागर किया है. मेरी बधाई स्वीकार करें.

नीरज

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