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बीत रहा है जीवन पल-पल

>> Friday, December 28, 2007


बीत रहा है जीवन पल-पल
समय हाथ से छूट रहा
आने वाले से पहले ही
कोई पीछे छूट रहा

आए कितने वर्ष यहाँ पर
कुछ भी हाय नहीं किया
इतने वर्षों के जीवन में
कुछ भी हासिल नहीं हुआ

खाना-पीना मौज मनाना
इसको ही जीवन माना
पर-सेवा या पर पीड़ा को
नहीं कभी भी पहचाना

आएगा एक वर्ष और भी
जागेंगें कितने सपने
किन्तु भोग में डूबी आँखें
देखेंगीं अपने सपने

एक-एक पल शुष्क रेत सा
जीवन-घट से छूट रहा
फिर भी इस दुनिया से देखो
मोह बन्ध ना छूट रहा

जाता है जीवन से कोई
कोई दौड़ा आता है
आने-जाने के इस क्रम में
जीव भ्रमित हो जाता है

लगता है कल सुख आएगा
स्वप्न पूर्ण हो जाएगा
मृगतृष्णा में भटका मानव
जाने कब सुख पाएगा ?
आओ अब कुछ ऐसा सोचें
चिर आनन्द को पा जाएँ
स्व से हटकर पर की सोचें
जीवन सफल बना जाएँ

3 comments:

Divine India December 28, 2007 at 9:59 PM  

बहुत ही अच्छी लगी आपकी यह रचना… जिसमें प्रयास है… धिक्कार है… सोंच है कुछ करने के लिए… मुझे लगता है आने वाले नव वर्ष पर इससे बेहतर रचना नहीं हो सकती…।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ December 29, 2007 at 1:45 PM  

कविता की यह लाइनें बहुत अच्छी लगीं-
"आए कितने वर्ष यहाँ पर
कुछ भी हाय नहीं किया
इतने वर्षों के जीवन में
कुछ भी हासिल नहीं हुआ"
बधाई स्वीकारें।

Rajesh January 1, 2008 at 3:26 PM  

Aane wala kal jane wala hai, ho sake to usme zindagi mila do pal jo ye jane wala hai.......
kisi shayar ne bilkul sahi kaha hai. Bus aise hi kitne hi kal aayenge aur chale jayenge, naye varsh bhi purane ho jayenge, har baar yahi umeed lagaye baithe rahte hai ab kuchh badlega jaroor, per hi re dil, na hum badle na kuchh aur badla........

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