मेरे अनुभव को अपनी प्रतिक्रिया से सजाएँ

नारी तुम केवल सबला हो

>> Thursday, September 20, 2007


नारी तुम....
केवल सबला हो

निमर्म प्रकृति के फन्दों में
झूलती कोई अर्गला हो ।
नारी तुम...
केवल सबला हो ।

विष देकर अमृत बरसाती
हाँ ढ़ाँप रही कैसी थाती ।
विषदन्त पुरूष की निष्ठुरता
करूणा के टुकड़े कर जाती
विस्मृति में खो जाती ऐसे
जैसे भूला सा पगला हो
नारी तुम....
केवल सबला हो

कब किसने तुमको माना है
कब दर्द तुम्हारा जाना है
किसने तुमको सहलाया है
बस आँसू से बहलाया है
जिसका भी जब भी वार चला
वह टूट पड़ा ज्यों बगुला हो ।
नारी तुम--
केवल सबला हो

तुम दया ना पा ठुकराई गई
पर फिर भी ना गुमराह हुई
इस स्नेह रहित निष्ठुर जग में
कब तुमसी करूणा-धार बही ?
जिसने तुमको ठुकराया था
उसके जीवन की मंगला हो ।
नारी तुम --
केवल सबला हो

कब तक यूँ ही जी पाओगी ?
आघातों को सह पाओगी ?
कब तक यूँ टूटी तारों से
जीवन की तार बजाओगी ?
कब तक सींचोगी बेलों को
उस पानी से जो गंदला हो ?
नारी तुम ---
केवल सबला हो

लो मेरे श्रद्धा सुमन तम्हीं
कुछ तो धीरज पा जाऊँ मैं
अपनी आँखों के आँसू को
इस मिस ही कहीं गिराऊँ मैं
तेरी इस कर्कष नियती पर
बरसूँ ऐसे ज्यों चपला हो ।
नारी तुम --
केवल सबला हो

मेरी इच्छा वह दिन आए
जब तू जग में आदर पाए ।
दुनिया के क्रूर आघातों से
तू जरा ना घायल हो पाए
तेरी शक्ति को देखे जो
तो विश्व प्रकंपित हो जाए ।
यह थोथा बल रखने वाला
नर स्वयं शिथिल-मन हो जाए ।
गूँजे जग में गुंजार यही-
गाने वाला नर अगला हो
नारी तुम....
केवल सबला हो ।
नारी तुम केवल सबला हो ।

4 comments:

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' September 20, 2007 at 8:38 PM  

आदरणीय शोभा जी

तेरी शक्ति को देखे जो
तो विश्व प्रकंपित हो जाए ।

आपने नारी को जो नयी अभिव्यिक्ति दी है अपनी पंक्तियों में वही तो है मेरी आंखों में हर पल रहने वाली ममताभरी मां स्नेहमयी बहना पत्नी और मेरी प्यारी दुलारी राजकुमारी सी बेटियां। परन्तु हा रे दुर्भाग्य वह है कहां समाज में ससुराल में पति के सामने से लेकर सभी जगह समझौते करती हुयी मेरे हृदय को मर्माहत करती हुयी। यह मेरा नैराश्य हो सकता है इस विषय में किन्तु आपकी कविता आश्वस्त करती है कि नयी पीढ़ी इन पंक्तियों को साकार करेगी। बहुत बहुत उर्जापूणॅ रचना । आपका संदेश एक नयी पीढ़ी लायेगा जो हम सब की भावनाओं को समाज में यथार्थ में ला सकेगा निसन्देह एक दिन वह सुबह आयेगी

कहीं कहीं थोड़ा छन्द भंग है परन्तु वैचारिक ओज के आगे वह कहीं टिकता नहीं है। हार्दिक शुभकामनायें
सादर
श्रीकान्त मिश्र कान्त

Rajesh September 24, 2007 at 11:03 AM  

Shobha ji namaskaar,
कब किसने तुमको माना है
कब दर्द तुम्हारा जाना है
किसने तुमको सहलाया है
बस आँसू से बहलाया है
जिसका भी जब भी वार चला
वह टूट पड़ा ज्यों बगुला हो ।
There is definately pain in these lines. Wherever whosoever have got chance, they have always hurt a woman, that u call it NARI. A woman is a daughter as a child, a sister for the life time, a wife after the marriage and is a mother after giving birth to a child. In all the relations she is connected to a man as a father, brother, husband and son but always being hurt by this man only. Its always painful that the human being called "Man" whose life is not possible without a "NARI" has never understood the woman during all the stages of her life and the relations he has always with the woman in whatever way.
But Shobha ji, you have rightly said "Nari tum keval Sabla ho". The days have now gone away when Nari was "ABALA" and this woman is now constantly being better n bigger in all the fronts of her life, standing beside a man, who use to dominate the woman always. Now this "Abala" has become "Sabla" in reality.
Aur bhi ek baat main yahan per kahna chahoonga - Nari khood bhi Nari ki dushman hoti hai, in so many places, when they are "Saas", "Nanad", "Jethani" etc. The first thing this so called "Nari" has to do is to bring commonness and establish relations within themselves at so many fronts. This is also equally important. You must be knowing - "Charity begins at home". A woman has to settle down at this front first and then only they would be unitedly able to fight with the other fronts.
Really a good thought bronght out by you.

कुमार आशीष September 25, 2007 at 6:32 PM  

मेरी इच्छा वह दिन आए
जब तू जग में आदर पाए ।
दुनिया के क्रूर आघातों से
तू जरा ना घायल हो पाए
तेरी शक्ति को देखे जो
तो विश्व प्रकंपित हो जाए ।
यह थोथा बल रखने वाला
नर स्वयं शिथिल-मन हो जाए ।
नारी के आत्‍म-बल का आह्ववान करने वाली यह पंक्तियां काश हमारे विश्‍व को अनुनादित कर सकें.. यह कामना है।

मोहिन्दर कुमार October 2, 2007 at 7:32 PM  

शोभा जी

नारी विभिन्न रूपों में जीवन को एक रँगमय और जीने योग्य बनाती है..
कभी माँ, कभी बहन्, कभी सहचरणि और कभी दोस्त बन कर राह दिखाती है..
नारी निश्चय ही श्रद्धा, ममता व त्याग का रूप है और सदा आदरणीय है.

सुन्दर रचना के लिये बधायी

  © Blogger template Shiny by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP