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मेरे मन

>> Sunday, June 24, 2007


ऒ मेरे मन
अब तू भटकना छोड़ ।
कितना भटकेगा ?
कब तक भटकेगा ?
जहाँ भी तू सुख की
तलाश में जाता है-
वे सब दुख के साधन हैं ।
उनसे सुख की अपेक्षा क्यों ?
यह भ्रम और ना पाल ।
वैसाखियों के सहारे
चलना छोड़ दे ।
आत्मबल का सम्बल ले ।
और आगे बढ़ जा ।
और अगर सहारा ही चाहिए-
तो उस अविनाशी ,
सदा आनन्द स्वरूप का ले ।
जो सदा-सर्वदा तेरे साथ है ।
जो कभी तुझसे अलग नहीं ।
जो हर क्षण तुझे सँभालता है ।
लौटकर भी तो वहीं आना है ।
फिर----------
ये भटकन क्यों ?
चल आगे बढ़ जा ।
ये तेरा गंतव्य नहीं ।
केवल मार्ग के मोहक
दृश्य हैं ।
जो तुझे बहका रहे हैं ।
तू इनमें ना भटक ।
बस आगे बढ़ जा ।
आगे और-आगे ।

2 comments:

Rajesh June 25, 2007 at 2:02 PM  

"MERE MANN"
kya khoob rasta dikhaya hai mann ko, naa bhatkne ka, lekin kya yah sambhav hai?
Mann ko hamesha hi chanchal kaha hai, woh hamesha se hi bhatkta raha hai aur rahega, is ke ooper kisi ka koi control nahi hota.
Mann ko koi aaj tak bandh nahi paya, phir bhi ritu ji ne jo rasta dikhaya hai mann ko, na bhatkne ke liye, agar sach ho paya to waah badhiya hai........
khoob hi sunder kalpana di hai lekhika ne....
meri aur se unhe subh kamna e aur aise hi aur likhte rahe yahi kamna ke saath all the best

कुमार आशीष July 20, 2007 at 7:48 PM  

मन के घाट फिसलने का डर
लहरें भंवर अनेक।
परछाईं में मन की झलके
सूरज एक अनेक।
कभी फुर्सत में मेरे ब्‍लाग पर नजर डालिएगा-
http://suvarnveethika.blogspot.com

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