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मुसाफ़िर

>> Thursday, October 25, 2007

राह पर चल तो रही हूँ


लक्ष्य की ना कुछ खबर है


आँख में सपने बहुत हैं


डगमगाती पर नज़र है


ज़िन्दगी के इस सफ़र में


कैसे-कैसे मोड़ आए


लक्ष्य का ना कुछ पता था


पाँव मेरे डगमगाए


राह की रंगीनियों ने


था बहुत मुझको पुकारा


उस मधुर आवाज़ से भी


कर लिया अक्सर किनारा


कंटकों की राह चुन ली


किन्तु फिर भी मैं ना हारा


हाँ कभी आवाज़ कोई


प्रेम की दी जब सुनाई


पाँव मेरे रूक गए थे


राह में थी डगमगाई


ज़िन्दगी के स्वर्ण के पल


राह से मैने उठाए


और दामन में समेटे


राह में जो काम आए


तक्त मीठे और खट्टे


राह में कितने मिले हैं


शूल के संग फूल भी तो


राह में अक्सर बिछें हैं


अब तो आ पहुँचा समापन


दिख रहा रौशन उजाला


पाँव अब क्यों काँपते हैं


हृदय में जब है उजाला


बावले अब धीर धर ले


सामने अब मीत प्यारा


मिल गया तुमको किनारा

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>> Wednesday, October 24, 2007

अनुभूति में मेरी रचनाएँ

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meri परछाईh

>> Thursday, October 18, 2007

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कभी-कभी

>> Sunday, October 14, 2007


कभी-कभी सब कुछ
अच्छा क्यों लगने लगता है ?
बिना कारण कोई
सच्चा क्यों लगने लगता है ?
क्यों लगता है कि
कुछ मिल गया ?
अँधेरे में जैसे चिराग जल गया ?
हवाओं की छुवन
इतनी मधुर क्यों लगने लगती है ?
पक्षी की चहचहाहट
क्यों मन हरने लगती है ?
मन के आकाश में
रंग कहाँ से आ जाते हैं ?
किसी के अंदाज़
क्यों इतना भा जाते हैं ?
भीनी-भीनी खुशबू
कहाँ से आजाती है ?
और चुपके से
हर ओर बिखर जाती है ?
ना जाने कौन
कानों में चुपके से
कुछ कह जाता है ।
जिसे सुनकर-
मेरा रोम-रोम
मुसकुराता है ।

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मुसाफ़िर

>> Thursday, October 4, 2007


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

राह में चल तो रहा हूँ
पर लक्ष्य हीन -
गंतव्य धूमिल है
एक भीड़ के पीछे
चलता जा रहा हूँ
कभी काँटा चुभ जाता है
गति में अवरोध आजाता है
जब फूल मुसक्कुराता है
हृदय प्रफुल्लित हो जाता है
ऐसे अनेकों मोड़ आए हैं
जहाँ मेरे कदम डगमगाए हैं ।
राह की रंगीनियों से
आँखें चुँधियाई हैं ।
पर कुछ पल ठहर कर
राह ही अपनाई है ।
हर एक मोड़ पर
दिल मेरा ललचाया है
यात्रा में बार-बार
अवरोध गया आया है
फिर भी उठा हूँ
आगे बढ़ा हूँ
सतत् गतिशील
संघर्षमय , विकासोन्मुख
क्योंक मैं जानता हूँ
मैं हमेशा विजित हुआ हूँ
और होता रहूँगा ।
कर्म में मेरी निष्ठा
असीमित और अपरिमित है
मै अज़र-अमर अविनाशी हूँ
अपराजित, दुर्जेय हूँ
एक अनन्त यात्रा का पथिक
एक मुसाफ़िर

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मेरी कविता मेरी आवाज mai

>> Tuesday, October 2, 2007

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जीवन डगर

>> Saturday, September 29, 2007


जीवन डगर के बीचो-बीच
भीड़ में खड़ी देख रही हूँ --
आते-जाते लोग-
दौड़ते वाहन
कानों को फोड़ते भौंपू
पता नहीं ये सब
कहाँ भागे जा रहे हैं ?
हर कोई दूसरे को
पीछे छोड़
आगे बढ़ जाना चाहता है ।
सबको साथ लेकर चलना
कोई नहीं चाहता है ।
आगे बढ़ना है बस
किसी भी कीमत पर
किसी को रौंध कर
किसी को धकेल कर
किसी को पेल कर ।
हर कोई बस
आगे बढ़ जाता है ।
जीवन की डगर पर
भीड़ में खड़ी अचानक
अकेली हो जाती हूँ ।
कहीं कोई अपना
करीब नहीं पाती हूँ ।
हर रिश्ता इन वाहनों की तरह
दूर होने लगता है ।
मुझे पीछे धकेल कर
आगे निकल जाता है ।
और दिल में फिर से
एक अकेलापन
घिर आता है ।
जीवन की डगर पर अचानक
इतनी आवाज़ों के बीच
अपनी ही आवाज़
गुम हो जाती है ।
कानों में वाहनों के
चीखते-डराते हार्न
गूँजने लगते हैं
प्रेम की ममता की
आवाज़ें कहीं गुम
हो जाती हैं ।
मैं दौड़-दौड़ कर
हर एक को पुकारती हूँ
किन्तु मेरी आवाज़
कंठ तक ही रूक जाती है ।
लाख कोशिश के बाद भी
बाहर नहीं आती है ।
जीवन डगर पर-
अचानक कोई
बहुत तेज़ी से आता है
और मुझे कुचल कर
चला जाता है ।
मैं घायल खून से लथपथ
वहीं गिर जाती हूँ
किन्तु
ये बहता रक्त-
ये कुचली देह
किसी को दिखाई नही देती ।
जीवन की डगर में
मेरी आत्मा क्षत-विक्षत है
और मैं आज भी आशावान हूँ ।
मुझे लगता है
कोई अवश्य आयेगा
मेरे घावों को
सहलाने वाला
मुझे राह से
उठाने वाला ।
जीवन की डगर में
अतीत को दोहराती हूँ
खुद एक सड़क
बन जाती हूँ ।मुझे दिखने लगते हैं
आते जाते अनेक रिश्ते
जिन्होने पल दो पल के लिए
मुझे आबाद किया ।
आशा की किरणें बिखेरी
किन्तु बत्ती हरी होते ही
वे सब बिखर जाते हैं ।
कुछ पल बाद नए वाहन
इस सड़क पर आजाते हैं।
फिर से आँखों में
रौशनी कौधती हे ।
फिर से मैं बाँहें फैला कर
सबको गले लगाती हूँ ।
और---
अपनी इस दौलत पर
फूली नहीं समाती हूँ ।
किन्तु अचानक बत्ती
फिर हरी हो जाती है ।
जीवन की डगर
फर सूनी हो जाती है ।
ये सूनापन --
मुझे सालने लगता है ।
किन्तु तभी --
एक दृष्टि मिल जाती है ।
जीवन चलने का नाम है ।
रुकना या रोकना
जीवन का अपमान है ।
आगे और आगे
बढ़ते जाओ
कभी किसी पर
दोष मत लगाओ ।
क्योकि---
जीवन की डगर पर
लोग आते ही रहेंगें ।
नित नए रंगो से
जीवन सजाते ही रहेंगें ।
दिल में न कभी
रखना कशिश
आगे बढ़ने की
देना आशीष

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नारी तुम केवल सबला हो

>> Thursday, September 20, 2007


नारी तुम....
केवल सबला हो

निमर्म प्रकृति के फन्दों में
झूलती कोई अर्गला हो ।
नारी तुम...
केवल सबला हो ।

विष देकर अमृत बरसाती
हाँ ढ़ाँप रही कैसी थाती ।
विषदन्त पुरूष की निष्ठुरता
करूणा के टुकड़े कर जाती
विस्मृति में खो जाती ऐसे
जैसे भूला सा पगला हो
नारी तुम....
केवल सबला हो

कब किसने तुमको माना है
कब दर्द तुम्हारा जाना है
किसने तुमको सहलाया है
बस आँसू से बहलाया है
जिसका भी जब भी वार चला
वह टूट पड़ा ज्यों बगुला हो ।
नारी तुम--
केवल सबला हो

तुम दया ना पा ठुकराई गई
पर फिर भी ना गुमराह हुई
इस स्नेह रहित निष्ठुर जग में
कब तुमसी करूणा-धार बही ?
जिसने तुमको ठुकराया था
उसके जीवन की मंगला हो ।
नारी तुम --
केवल सबला हो

कब तक यूँ ही जी पाओगी ?
आघातों को सह पाओगी ?
कब तक यूँ टूटी तारों से
जीवन की तार बजाओगी ?
कब तक सींचोगी बेलों को
उस पानी से जो गंदला हो ?
नारी तुम ---
केवल सबला हो

लो मेरे श्रद्धा सुमन तम्हीं
कुछ तो धीरज पा जाऊँ मैं
अपनी आँखों के आँसू को
इस मिस ही कहीं गिराऊँ मैं
तेरी इस कर्कष नियती पर
बरसूँ ऐसे ज्यों चपला हो ।
नारी तुम --
केवल सबला हो

मेरी इच्छा वह दिन आए
जब तू जग में आदर पाए ।
दुनिया के क्रूर आघातों से
तू जरा ना घायल हो पाए
तेरी शक्ति को देखे जो
तो विश्व प्रकंपित हो जाए ।
यह थोथा बल रखने वाला
नर स्वयं शिथिल-मन हो जाए ।
गूँजे जग में गुंजार यही-
गाने वाला नर अगला हो
नारी तुम....
केवल सबला हो ।
नारी तुम केवल सबला हो ।

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