मेरे अनुभव को अपनी प्रतिक्रिया से सजाएँ

कभी-कभी ......

>> Wednesday, June 25, 2008

कभी-कभी हम सब
साथ रहते हुए भी -
कितने अज़नबी हो जाते हैं ?
एक दूसरे की व्यथा, वेदना,पीड़ा,
समझ ही नहीं पाते हैं ?
वैसे हम सगे हैं और अपने भी-
फिर भी -
एक दूसरे को
तनाव, चुभन व दर्द
ही क्यों दे जाते हैं ?
ये सच है कि-
दिल में प्रधान प्रेम ही है-
फिर भी ------
उपेक्षित और असुरक्षित
क्यों हो जाते हैं ?
एक दूसरे को समझना
क्या इतना कठिन काम है ?
फिर जन्मों का बन्धन-
क्यों ठहराते हैं ?
कहीं अनेक जन्मों से-
उलझते तो नहीं जा रहे हैं ?
करीब आने की धुन में-
दूर तो नहीं जा रहे हैं ?
ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं -
जिनके उत्तर कभी नहीं मिलते ।
इसीलिए दिल के ऑंगन में-
सुरभित- सुन्दर फूल नहीं खिलते ।

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एक पिता

>> Sunday, June 8, 2008

मैंने देखा एक पिता
एक नन्ही बालिका की
मधुर मुस्कान पर
सुध-बुध भूला पिता……
.आँखों से छलकतीस्नेह की गागर
लबालब वात्सल्य छलकाती थी
और बालिका एक किलकारी
अतुल्य दौलत दे जाती थी
क्रूर, कठोर, निर्दय जैसे विशेषण
दयालु, कोमल और बलिदानीमें
ढल गए....
बेटी को देख……
सारे हाव-भाव बदल गए
क्या यह वही पुरूष है
जिसे नारी शोषक और
अत्याचारी समझती है ?
ना ना ना .......
ये तो एक पिता है
जो बेटी को पाकर
निहाल हो गया है
ममता की यह बरसात
जब और आवेग पाती है
पत्नी से भी अधिक प्रेम
बेटी पा जाती है
प्रेम की दौलत बस
बेटी पर बरस जाती है
और प्रेम की अधिकारिणी
प्रेम से वंचित रह जाती है
प्रेमान्ध पिताघरोंदे बनाता है
अपने सारे सपने
बेटी में ही पाता है
पर बेटी के ब्याह पर
बिल्कुल अकेला रह जाता है
पिता और पुत्री का
एक अनोखा ही नाता है

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अनेकता में एकता

>> Wednesday, June 4, 2008


अनेकता में एकता

 मेरे भारत की विशेषता

  यही पाठ पढ़ा-

और यही पढ़ाया

किन्तु प्रत्यक्ष में

 एकता का

कहीं दर्शन ना पाया

 

कभी धर्म के नाम पर

खुले आम घर जले

 मन्दिर मस्ज़िद टूटे

 

 

 लाखों बर्बाद हो गए

, फिर भी हमने…….

धर्म निरपेक्षिता की

डींगे हाँकी….

 

 

प्रान्तीयता के आधार पर

देश के सर्वोच्च पद का निर्धारण

 राष्ट्रीयता के हृदय पर

एक बड़ा आघात

और सारा देश चुप…..

पद का सही उम्मीदवार

अपमान सह गया

और राष्ट्र मूक रह गया

 

 

और आज फिर..

एक ओर……..

प्रान्तीयता की आवाज़

कानों में शीषा डाल रही है

देश के हर नागरिक को

किंकर्तव्य विमूढ़ बना रही है

आशा की किरणें बहुत

क्षीण होती जा रही हैं

और हम गर्व से

राष्ट्रीयता का…..

 राग आलाप रहे हैं

डींगें हाँक रहे हैं


दूसरी ओर……

आरक्षण का राक्षस

अपनी बाँहें फैला रहा है

और सारा देश विवशता से

कैद में कसमसा रहा है

यह आरक्षण की माँग है या

सुरसा का मुँह

जो निरन्तर बढ़ता ही जारहा है

कोई भी आश्वासन

काम नहीं आरहा है।

 

 

भारत माता शर्मिन्दा है

अपनी सन्तान के

 कुकृत्यों पर

उसका अंग-अंग

पीड़ा से कराह रहा है

ना जाने कौन ये

जहर फैला रहा है

कोई भी उपाय

काम नहीं आ रहा है

 

 

 

मेरे देश की आशाओं

देश को यूँ ना जलाओ

माँ के घावों पर

थोड़ा सा मरहम भी लगाओ

 हम एक हैं

फिर से  ये प्रतिग्या दोहराओ

दे दो विश्वास जो

खोता जा रहा है

 

देश के हर कोने से

यही आग्रह और

यही स्वर आरहा है

 

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प्रकाश की खोज

>> Friday, May 30, 2008






मैं एक अजर-अमर

शुद्ध स्वरूप आत्मा हूँ

शान्ति मेरा स्वभाव

और प्रकाश मेरा स्वरूप है

इसी कारण ….

सदा-सर्वदा

प्रकाश की ओर अग्रसर हूँ

जब भी,जहाँ भी

प्रकाश की कोई किरण

पाती    हूँ

उसी ओर बढ़  जाती हूँ

किन्तु पास जाने पर

प्रकाश नहीं धोखा निकलता है

एक ऐसा धोखा……

जो आँखों को चौंधियाता है

किन्तु रौशनी नहीं देता

सत्य तो दिखाता है

किन्तु नग्न सत्य

जिसे देख आँखें शान्ति नहीं पाती

जलने लगती हैं…..

हृदय  और अधिक उद्वेलित

और आवेशित हो जाता है

शान्ति की तलाश में

अशान्ति ही पाता है….

आज तक…..

प्रकाश ने सर्वदा

आँखें ही चौंधियाई हैं

जीवन की पूँजी बस

यूँ ही गँवाई है

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प्रेमी बादल

>> Monday, May 26, 2008


देखो आकाश में

घना अँधेरा छाया है ।

लगता है कोई प्रेमी

बादल बन आया है ।

इसके मन भावन रूप पर

धरती मोहित हो जाएगी ।

प्रेम की प्यासी अपना

आँचल फैलाएगी ।

और अमृत की वर्षा में

आकंठ डूब जाएगी ।

ऑंखों में रंग और

ओठों पे मधुर गीत

आया है ।

लगता है कोई प्रेमी

बादल बन आया है ।

गर्मी की तपन

अब शान्त हो जाएगी ।

सूखी सी धरती पर

कलियाँ खिल जाएँगी ।

हर तरफ अब बस

हरियाली ही छाएगी ।

गर्मी से सबको ही

राहत मिल जाएगी ।

झूलों में बैठ कर

गीत याद आया है ।

लगता है कोई प्रेमी

बादल बन आया है ।

धरती की प्रतीक्षा

रंग ले आई है ।

मदमदाती आँखों में

प्रेम छवि छाई है ।

अंग- अंग में यौवन की

मदिरा छलक आई है ।

नव अंकुरित सृष्टि ने

नयनों को लुभाया है ।

लगता है कोई प्रेमी

बादल बन आया है ।

बादल और प्रेमी

आते और जाते हैं ।

संवेदनाओं के मधुर

फूल खिला जाते हैं ।

कभी यहाँ, कभी वहाँ

अलख जगाते हैं ।

नारी को केवल

सपने दे जाते हैं ।

प्रेम में मत पूछो

किसने क्या पाया है ।

लगता है कोई प्रेमी

बादल बन आया है ।


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एक मधुर गीत- नैना ठग लेंगें

>> Sunday, May 25, 2008

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कभी-कभी

>> Tuesday, May 20, 2008


कभी-कभी सब कुछ

अच्छा क्यों लगने लगता है ?

बिना कारण कोई

सच्चा क्यों लगने लगता है ?

क्यों लगता है कि

कुछ मिल गया ?

अँधेरे में जैसे चिराग जल गया ?

हवाओं की छुवन

इतनी मधुर क्यों लगने लगती है ?

पक्षी की चहचहाहट

क्यों मन हरने लगती है ?

मन के आकाश में

रंग कहाँ से आ जाते हैं ?

किसी के अंदाज़

क्यों इतना भा जाते हैं ?

भीनी-भीनी खुशबू

कहाँ से आजाती है ?

और चुपके से

हर ओर बिखर जाती है ?

ना जाने कौन

कानों में चुपके से

कुछ कह जाता है ।

जिसे सुनकर-

मेरा रोम-रोम

मुसकुराता है ।

 

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काश!

>> Friday, May 16, 2008


काश!
मैं बन जाऊँ एक सुगन्ध
जो सबको महका दे
सारी दुर्गन्ध उड़ा दे
या

बन जाऊँ एक गीत
जिसे सब गुनगुनाएँ
हर दिल को भा जाए

अथवा…
बन जाऊँ नीर
सबकी प्यास बुझाऊँ
सबको जीवन दे आऊँ

या फिर..
बन जाऊँ एक आशा
दूर कर दूँ निराशा
हर दिल की उम्मीद

अथवा…
बन जाऊँ एक बयार
जो सबको ताज़गी दे
जीवन की उमंग दे
नव जीवन संबल बने
तनाव ग्रस्त
..
प्राणी की पीड़ा पर
मैं स्नेह लेप बन जाऊँ

जग भर की सारी
चिन्ताएँ मिटा दूँ
जी चाहता है आज
निस्सीम हो जाऊँ
एक छाया बन
नील गगन में छा जाऊँ


सारी सृष्टि पर अपनी
ममता लुटाऊँ

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