मेरे अनुभव को अपनी प्रतिक्रिया से सजाएँ

मँहगाई

>> Monday, August 11, 2008


रोज बढ़ जाती हैं ज़ालिम कीमतें

क्या खरीदूँ और किसका नाम दूँ


हर कदम मँहगाई का दानव खड़ा

कैसे अपने दिल को मैं आराम दूँ।

आरजूएँ दफ्न होकर रह गईं
भूख को अब किस कुँए में डाल दूँ


रिश्ते-नाते भी हुए बेज़ान से
ज़ेब में कौड़ी नहीं जो बाँट दूँ

हैं सजे बाज़ार छाई रौनकें
एक चादर इनपे लाओ डाल दूँ।

आँख में चुभती हैं लाखों ख्वाइशें
दर्द इनका आँसुओं में ढ़ाल दूँ।

जल रहा है देश इसकी आग में
अब शुभी किसको यहाँ इल्ज़ाम दूँ।

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वरदान

>> Tuesday, August 5, 2008


मैने ज़िन्दगी से
खुशी का बस..
एक पल माँगा था
उसने उदार होकर
अपार भंडार दे दिया

प्रसन्नता की बस एक
लहर माँगी थी......
उसने पूरा पारावार दे दिया
तृप्ति का,सुख का
बस एक कण माँगा था
उसने उल्लास का....
दरिया ही बहा दिया

उसकी उदारता से
अभिभूत हो गयी हूँ
और कुछ भयभीत भी
हो गयी हूँ.....
क्या इतना सुख
सँभाल भी पाऊँगी ?
आनन्दातिरेक से
पागल तो नहीं हो जाऊँगी
?

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कलम के सिपाही! तुम्हें नमन.......

>> Thursday, July 31, 2008


प्रिय पाठकों,
आज महान कहानी कार मुंशी प्रेमचन्द की जन्म तिथि है। एक महान कहानीकार को नमन करते हुए प्रस्तुत कर रही हूँ उनका संक्षिप्त परिचय।
कलम के सिपाही प्रेमचन्द जी नाम लेते ही आँखों के समक्ष एक चित्र उभरता है- गोरी सूरत, घनी काली भौंहें, छोटी-छोटी आँखें, नुकीली नाक और बड़ी- बड़ी मूँछें और मुस्कुराता हुआ चेहरा। टोपी,कुर्ता और धोती पहने एक सरल मुख-मुद्रा में छिपा एक सच्चा भारतीय। एक महान कथाकार- जिसकी तीक्ष्ण दृष्टि समाज और उसकी बुराइयों पर केन्द्रित थी। एक समग्र लेखक के रूप में उन्होने मध्यवर्गीय समाज को अपने साहित्य में जीवित किया।
सीधा- सरल जीवन जीने वाले प्रेमचन्द जी का जन्म ३१ जुलाई १८८० को लमही ग्राम में हुआ था। माता-पिता ने नाम रखा धनपत और प्यार करने वालों ने नाम दिया नवाब। पारिवारिक जीवन संघर्षों से परिपूर्ण था। बचपन में ही माँ चल बसी और नन्हें बालक को सौतेली माँ की ज्यादतियों का शिकार होना पड़ा।
घर पर प्यार के अभाव में बालक घर का आँगन छोड़ प्रकृति की गोद में जा बैठा। प्रकृति ने बाँहें फैला कर बालक को अपना संरक्षण दिया। गरीबी, घुटन, रूखेपन को धनपद ने कहकहों में उड़ा दिया और अपनी पीड़ा को लेखनी में उतारना शुरू किया। रात के अँधेरे में डिबरी लेकर बैठते और पढ़ाई के साथ-साथ साहित्य रचना करते।
जीवन का अधिकतर ग्यान जीवन की पाठशाला में सीखा।
अनेक पत्र- पत्रिकाओं का सम्पादन करते हुए ख्याति प्राप्त की। १९०१से इनकी लेखनी चलनी प्रारम्भ हुई तो चलती ही रही। इन्होने कथा जगत को तिलिस्म , ऐयारी और कल्पना से निकाल कर राष्ट्रीय और क्रान्तिकारी भावनाओं की दुनिया में प्रवेश कराया। १९३० में 'हँस' निकाला और १९३२ में 'जागरण'।
सरकारी नौकरी में स्वाभिमान आड़े आया और त्यागपत्र देकर गाँव लौट आए। कलम चलाकर ४०-५० रपए में घर चलाने लगे। राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रिय भूमिका अदा खी। कभी जेल नहीं गए, किन्तु सैनिकों की वाणी में जोश भरा। 'सरस्वती' पत्रिका के माध्यम से अपने विचार जन-जन में पहुँचाए।
उन्होने पहली बार कथा साहित्य को जीवन से जोड़ा और सामाजिक सत्यों को उजागर कर अपने दायित्व का निर्वाह किया। उनमें पर्याप्त जागरूकता और सूक्ष्म दृष्टि थी। उन्होने अपने युग को पहचाना । जीवन की पाठशाला में जो भी सीखा उसी को साहित्य का आधार बनाया। समाज, जीवन और भावबोध प्रेमचन्द के लिए महत्वपूर्ण बातें थीं। वे ऐसी सामाजिक व्यवस्था चाहते थे जिसमें किसी का भी शोषण ना हो ।प्रेमचन्द प्रगतिशील साहित्यकार थे किन्तु उनकी प्रगतिशीलता आरोपित नहीं थी। प्रियता पर करारी चोट की, उनका विविध चित्रण किया। निर्मला उपन्यास मध्यवर्ग और उसकी कमजोरियों का कच्चा चिट्ठा है। गोदान में ग्रामीण जीवन को जीवित किया है।
उनका साहित्य एक ओर भारत की अधोगति, और दूसरी ओर भारत की भावी उन्नति के पथ पर चला है। उन्होने जिस विचारधारा का सूत्रपात किया वह थी पापाचार का निराकरण। उन्होने अपने उपन्यासों में धर्म की पोल खोली है। हिन्दू धर्म की की जीर्णशीर्णता का सुन्दर चित्रण किया व धर्म को मानवता वादी आधार प्रदान किया। उन्होने मनुष्य सेवा को ही ईश सेवा माना।
प्रेमचन्द जी ने अपने समाज की रूढ़ियों पर खुलकर प्रहार किया। उन्होने अपने उपन्यासों के द्वारा पाठकों तक ऐसी भावनाओं का सम्प्रेषण किया जिसमें जीवन के प्रति गरिमा हो। उन्होने समाज को दिशा प्रदान की। प्रेमचन्द जी ने पूँजीवाद का तीव्र विरोध किया।
नारी को प्रगतिशील बनाया तथा बाल-विवाह और अनमेल विवाह के दुष्परिणामों से समाज को परिचित कराया। निर्मला का करूण अन्त चीख-चीख कर यही कहता है। दहेज प्रथा से उन्हे चिढ़ थी। दहेज का दुष्परिणाम भी इनके उपन्यासों में मिलता है।
उन्होने किसानों की समस्याओ और उनकी कमियों को लेखनी में उतारा। मज़दूरों, युवकों, विद्यार्थियों और अछूतों को साहित्य का विषय बनाया और उनके कष्टों को वाणी दी।
शोषण,गुलामी,ढ़ोंग, दंभ,स्वार्थ रूढ़ि, अन्याय,,अत्याचार सबकी जड़ें खोदीं और मानवता की स्थापना की।
गोदान, मंगलसूत्र निर्मला सेवासदन इनकी अमर कृतियाँ हैं।
प्रेमचन्द जी की कहानियाँ हिन्दी साहित्य का श्रृंगार हैं। बड़े भाई साहब, ईदगाह, पूस की रात, शतरंज के खिलाड़ी, कफ़न,आज भी प्रासंगिक हैं। समाज का हर वर्ग अपनी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ उनमें जीवित है।
आर्थिक समस्याएँ उन्हें फिल्म जगत में ले गईं किन्तु समझौता करना उनका स्वभाव नहीं था। वापिस आ गए और संघर्षों से भरा जीवन जीते रहे । ८ अक्टूबर १९३६ को मात्र ५६ वर्ष की अवस्था में पंचभौतिक शरीर को त्याग परम तत्व में विलीन हो गए।
प्रेमचन्द की कथाएँ और उनके उपन्यास हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि है। जब-जब उन्हे पढ़ा जाएगा, जन मानस उन्हे अपने बहुत करीब ही पाएगा। उस पवित्र आत्मा को मेरा शत-शत नमन।

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परिवर्तन

>> Monday, July 28, 2008


परिवर्तन सृष्टि का नियम है

परिवर्तन जीवन का क्रम है

परिवर्तन एक अकाट्य सत्य है

फिर भी ----

हम परिवर्तन को स्वीकार

क्यों नहीं कर पाते हैं ?

जरा-जरा सी बात पर

क्यों इतना घबराते हैं ?


बचपन में अबोध बच्चा

जब माता की छाती से चिपक

तोतली जुबान में प्यार जताता है

माँ-बाप की आँखों में तब

तृप्ति एवँ सन्तोष का

भाव उभर आता है

और जब वह बड़ा होकर

पत्नी के परिरम्भण में

असीम सुख पाता है

उसी की हाँ में हाँ मिलाता है

तब माँ-बाप को ये

समझ क्यों नहीं आता है

कि-- परिवर्तन सृष्ट का नियम है


जीवन का बस एक क्रम है

बाप के बीमार होने पर

बहू का बड़बड़ाना

बेटे का दवा लाने में

बहाने बनाना सुनकर

क्यों अतीत में लौट आते हैं

परिवर्तन को सहज़

स्वीकर क्यों नहीं कर पाते हैं ?

इतना शोर क्यों मचाते हैं?


बस मान लो यह कि

यह एक अकाट्य सत्य है

इसको स्व की सीमाओं में

कैद ना करना बेकार है

यह ईश की अनोखी देन

और उसका अनुपम

उपहार है ।

सृष्टि का श्रृंगार है ।

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मन के पंख नहीं होते पर

>> Friday, July 25, 2008


मन के पंख नहीं होते पर
फिर भी मन उड़ जाता है
व्याकुल पंखों को फैलाकर
नील गगन में जाता है
कभी दिखाता सुन्दर सपने
उर उम्मीद जगाता है
घोर निशा के तिमिरांचल में
सूर्य किरण बिखराता है ।

असफ़लता की घोर निराशा
जीवन में जब आती है
विगत सुःखों की झिलमिल झाँकी
आँखों में तिर जाती है
देखे थे जो सुन्दर सपने
उनकी याद सताती है।
चिर वियोग की तीव्र वेदना
आँखों में तिर जाती है

यह पागल सा हो मतवाला
तृष्णा- जाल बिछाता है
अपने पंखों संग बाँधकर
दूर बहुत ले जाता है
देख नयन का सुन्दर उत्सव
हृदय- हर्षित हो जाता है
तभी अचानक क्रूर सत्य भी
हँसी छीन ले जाता है

कभी सोचती त्वरित गति से
पिंजर एक बनाउँ मैं
चंचल गति को इसकी रोकूँ
अपना दास बनाऊँ मैं
किन्तु हृदय से ध्वनि ये आती
मन को लाड़- लड़ाऊँ मैं
भूल सत्य को इसके संग ही
उन्मत्त दौड़ लगाऊँ मैं

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घिन आने लगी है 'घोड़ामण्डी' से

>> Wednesday, July 23, 2008


लगते थे ...
.बहुत अच्छे तुम
बातें तुम्हारी .....
सीधे दिल के अंदर
नसों में खून ...
..उबलने लगता था
कुछ भी करने को आतुर
चिलचिलाती धूप में
पसीने से लथपथ ..
आते थे जब भी ..
भटकते हुए मांग कर
किसी से 'लिफ्ट'
अथवा पैदल ...

तुम्हारा भूखा प्यासा
पदयात्रा से थका चेहरा
कर देता था व्याकुल
हर गावं में मां को ..
दौड़ पड़ती थी बहना
ले पानी का गिलास
भाभी टांक देती थी बहुधा
तुम्हारे ‘फटे हुए कुरते’ के बटन
बाबा सोचते थे हरबार
देने को एक नया कुरता
मुझसे पहले ….. तुम्हें
सीखा मैंने जिज्ञासु
तुम्हारे थैले में भरी किताबों से
नैतिकता, राष्ट्रप्रेम, त्याग, समाजसेवा
इतिहास और आदर्श का हर पाठ
उत्प्रेरित हो तुमसे ही ....……………..
........................
किंतु ......
जबसे देखता हूँ तुम्हें…
पहने हुए तरह तरह के मुखौटे
बदलते हुए टोपियाँ …. हरपल
निकलते हुए कार से
गावं के उस मिटटी के चबूतरे का
उडाते हुए उपहास .....

धूलधूसरित मां .....
घंटों देखती रहती है
नीले, पीले, लाल, हरे,
केसरिया झण्डों को..
विस्फारित नेत्रों से ....
आज सुनती है जब
'घोड़ामण्डी' के भाव
थूक देती है पिच्च से .
.और उसके चेहरे पर
पढ़ते हुए भाव …..
मुझे घिन आने लगी है
तुम्हारी नौटंकी से…
तुम्हारे चेहरे से ....तुमसे
....

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टीस सी जग जाती है

>> Monday, July 21, 2008


मन का तहखाना

कैद है जिसमें

असंख्य रिश्ते--

जिनको आज तक

नाम नहीं दे पाई

किन्तु---आज भी-

-हर रिश्ते से बढ़कर

हर कदम पर

हर पल

बहुत करीब रहते हैं

अकेलेपन में

उनकी परछाई

सदा आस -पास

मँडराती रहती है

अदृश्य बाँहें-

सदा संरक्षण देती

तथा प्यार से

थपथपाती हैं

कभी-कभी अचानक

अतीत प्रत्यक्ष होकर

आसक्ति जगाता है

बीते दिनों को

फ़िर से बुलाता है

प्रेमांगन में-

भीनी सी खुशबू

तीव्रता से आती है

और दूर ले जाती है

अलभ्य को ---

पाने की कामना

बलवती हो जाती है

और --दिल के किसी कोने में

एक टीस सी जग जाती है ।

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विभिन्नता में एकता

>> Thursday, July 17, 2008



मेरे देश की विशेषता

हमेशा यही पाठ पढ़ा-

और यही पढ़ाया

किन्तु प्रत्यक्ष में

एकता का कहीं

दर्शन ना पाया


कभी धर्म के नाम पर

खुले आम घर जले


फिर भी हमने……

.धर्म निरपेक्षिता की

डींगे हाँकी….


जाति के आधार पर आरक्षण

युवा शक्ति का विद्रोह

हड़तालें,तोड़-फोड़

आत्मदाह की घटनाएँ

हमारा कलेजा चीर गई

फिर भी हमने

समानता की दुहाई दी


प्रान्तीयता के आधार पर


राष्ट्रीयता के हृदय पर

एक बड़ा आघात

और सारा देश चुप….

.पद का सही उम्मीदवार

अपमान सह गया

और राष्ट्र मूक रह गया


और आज……

प्रान्तीयता का राक्षस

आतंक मचा रहा है

चीखों और पुकारों से

दिल घबरा रहा है

नफरत की आँधी

सब कुछ उड़ा रही है


अपनी सन्तान के

कुकृत्यों पर

उसका अंग-अंग

पीड़ा से कराह रहा है

ना जाने कौन

ये जहर फैला रहा है

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