मेरे अनुभव को अपनी प्रतिक्रिया से सजाएँ

मैं और मेरी परछाई

>> Tuesday, July 15, 2008


हम दो हैं-
मैं और मेरी परछाई ।
जब भी मैं –
परिस्थितियों में
सहज होना चाहती हूँ -
मेरी परछाई
बहुत दूर भाग जाती है ।
ना जाने उसे कब और कैसे
अवसर मिल जाता है और
वह तुमसे मिल आती है ।

जब भी मैं काम में
मन लगाती हूँ -
वो कल्पना की
रंगीन चादर बिछाती है ।
तितली की तरह इधर-उधर
मँडराती है ।

जब मैं किसी मीटिंग में बैठ
गम्भीरता से सिर हिलाती हूँ-
वह शरारत से गुदगुदाती है ।
हाथ पकड़ कर बाहर ले आती है ।
जाने कैसे-कैसे बहाने बनाकर
अपनी बातों को सही ठहराती है ।

जब भी मैं जीवन को
सहज अपनाती हूँ --
वह विरोध कर देती है ।

मैं इसे कैसे समझाऊँ ?
जान नहीं पाती हूँ ।
घूर कर , डाँट कर
झीक कर रह जाती हूँ ।
तुम इस परछाई को
सच ना समझना ।
इसके साथ कोई ख्वाब
ना बुन ना ।
क्योकि ये केवल परछाई है
सच नहीं ।
कभी भी धोखा दे जायेगी
जब मेरी ही ना हुई तो
तुम्हारी क्या खा़क हो पाएगी ?

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कुछ प्रश्न

>> Sunday, July 13, 2008




कुछ प्रश्न उठ रहे हैं
मेरे ज़हन में--
उत्तर दोगे?
सच-सच
तुम्हारी दृष्टि में
प्रेम क्या है
किसी से जुड़ जाना
या उसे पा लेना
वैसे पाना भी एक प्रश्न है
उसके भी कई अर्थ हैं
कैसे पाना--
शरीर से- या मन से
यदि शरीर से--
तो एक दूसरे को पाकर भी
परिवार पूर्ण क्यों नहीं हो पाते-
यदि मन से--
तो सारा आडम्बर क्यों -
इन चिरमिराते साधनों से
तुम किसे जीतना चाहते हो-
उस मन को-
जो स्वछन्दता भोगी है
या उस तन को
जो भुक्तभोगी है ?
सोचो तुम्हारा
गंतव्य क्या है ?
ये व्याकुलता
ये तड़प -
किसके लिए है ?
यदि कुछ पाना ही नहीं
तो मिलें क्यों ?
सब कुछ तो मिल रहा है
सामीप्य,संवेदना

साहचर्य और प्रेम भी
फिर क्या अप्राप्य है?
क्यों बेचैन हो?


मैं तो सन्तुष्ट हूँ
जो मिल रहा है
उससे पूर्ण सन्तुष्ट
हाँ कुछ इच्छाएँ जगती हैं
किन्तु मैं इन्हें
महत्व नहीं देती
मेरी दृष्टि में
ये मूल्यहीन हैं
मेरा प्राप्य
आत्मिक सुख है
मैं उस सीमा पर
पहुँचना चाहती हूँ
जिसके आगे मार्ग
समाप्त हो जाता है
मेरी आक्षाएँ असीम हैं
बोलो चलोगे ?
दोगे मेरा साथ ?

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कवि तुम पागल हो--?

>> Wednesday, July 9, 2008

कवि तुम पागल हो--?

सड़क पर जाते हुए जब
भूखा नंगा दिख जाता है
हर समझदार आदमी
बचकर निकल जाता है
किसी के चेहरे पर भी
कोई भाव नहीं आता है
और तुम---?
आँखों में आँसू ले आते हो
जैसे पाप धोने को
आया गंगाजल हो--
कवि तुम पागल हो ---?

जीवन की दौड़ में
दौड़ते-भागते लोगों में
जब कोई गिर जाता है
उसे कोई नहीं उठाता है
जीतने वाले के गले में
विजय हार पड़ जाता है
हर देखने वाला
तालियाँ बजाता है
पर-- तुम्हारी आँखों में
गिरा हुआ ही ठहर जाता है --
जैसे कोई बादल हो--
कवि-- तुम पागल हो--?

मेहनत करने वाला
जी-जान लगाता है
किन्तु बेईमान और चोर
आगे निकल जाता है
और बुद्धिजीवी वर्ग
पूरा सम्मान जताता है।
अपने-अपने सम्बन्ध बनाता है
पर तुम्हारी आँखों में
तिरस्कार उतर आता है
जैसे- वो कोई कातिल हो
कवि? तुम पागल हो --

सीधा-सच्चा प्रेमी
प्यार में मिट जाता है
झूठे वादे करने वाला
बाजी ले जाता है
सच्चा प्रेमी आँसू बहाता है
तब किसी को भी कुछ
ग़लत नज़र नहीं आता है
पर--तुम्हारी आँखों में
खून उतर आता है
उनका क्या कर लोगे
जिनका दिल दल-दल हो
कवि तुम पागल हो

धर्म और नैतिकता की
बड़ी-बड़ी बातें करने वाला
धर्म को धोखे की दुकान बनाता है
तब चिन्तन शील समाज
सादर शीष नवाता है
सहज़ में ही--
सब कुछ पचा जाता है
और तुम्हारे भीतर
एक उबाल सा आजाता है
लगता है तुमको क्यों
चर्चा ये हर पल हो ?
कवि तुम पागल हो --?

ये दुनिया तो ऐसी है
ऐसी रहेगी
तुम्हारी ये आँखें यूँ
कब तक बहेंगी?
पोछों अब इनको
अगन को जगा दो
सृष्टा बने हो तो
अमृत बहा दो
उठाओ कलम और
शक्ति बहा दो

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अमर प्रेम……

>> Sunday, July 6, 2008


असंख्य लहरों से तरंगित
जीवन उदधि
अब अचानक शान्त है
एकदम शान्त

घटनाओं के घात-प्रतिघात
अब आन्दोलित नहीं करते
तुम्हारा क्रोध,
तुम्हारी झुँझलाहट देख
आक्रोष नहीं जगता
बस सहानुभूति जगती है

कभी-कभी तुम अचानक
बहुत अकेले और असहाय
लगने लगते हो
दिल में जमा क्रोध का ज्वार
कब का बह गया
अब कोई शिकायत नहीं
कोई आत्मसम्मान नहीं

बस बिखरे हुए रिश्तों को
समेटने में लगी हूँ
तुम्हें पल-पल बिखरता देख
मन चीत्कार उठता है
और मन ही मन सोचती हूँ
ये त मेरा प्राप्य नहीं था

मैं तुम्हें कमजोर और
हारता हुआ नहीं
सशक्त और विजयी
देखना चाहती थी
पता नहीं क्यों तुम
सारे संसार से हारकर
मुझे जीतना चाहते हो
भला अपनी ही वस्तु पर
अधिकार की ये कैसी कामना है

जो तुम्हे अशान्त किए है
भूल कर सब कुछ
बस एक बार देखो
मेरी उन आँखों में
जिनमें तुम्हारे लिए
असीम प्यार का सागर
लहराता है
अपना सारा रोष
इनमें समर्पित कर दो
और सदा के लिए
समर्पित हो जाओ
संशयों से मुक्ति पाजाओ।

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ये क्या हुआ…….

>> Sunday, June 29, 2008


मेरी एक झलक पर

बाग-बाग होने वाले

मेरे प्यारे पिता !

तुम इतना क्यों बदल गए?

मुझे भरपूर प्यार और

आराम देने वाले तुम..

हाँ तुम ही तो थे

मेरी एक-एक पीड़ा पर

तुम्हारी आँखों से

आँसुओं का सागर

बह जाता था

उन दूधिया वात्सल्य

भरी आँखों में आज

आक्रोष क्यों आगया ?

तुम्हारी अँगुली पकड़कर

बचपन में चलना सीखा

तुम्हारी स्नेहिल छाया में

सदा स्वयं को सुरक्षित पाया

मेरा एक मात्र सहारा

बस तुम ही तो थे

माँ से भी बस मेरा

भूख का ही नाता था

पर तुमसे तो मेरा रिश्ता

अभिन्न और अटूट था

और तुम भी

हाँ तुम भी मेरे लिए

सदा,सर्वदा प्रस्तुत रहे

फिर आज ये क्या हो गया?

मेरे पिता तुम

मेरे रक्षक से

मेरे घातक कैसे हो गए ?

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कभी-कभी ......

>> Wednesday, June 25, 2008

कभी-कभी हम सब
साथ रहते हुए भी -
कितने अज़नबी हो जाते हैं ?
एक दूसरे की व्यथा, वेदना,पीड़ा,
समझ ही नहीं पाते हैं ?
वैसे हम सगे हैं और अपने भी-
फिर भी -
एक दूसरे को
तनाव, चुभन व दर्द
ही क्यों दे जाते हैं ?
ये सच है कि-
दिल में प्रधान प्रेम ही है-
फिर भी ------
उपेक्षित और असुरक्षित
क्यों हो जाते हैं ?
एक दूसरे को समझना
क्या इतना कठिन काम है ?
फिर जन्मों का बन्धन-
क्यों ठहराते हैं ?
कहीं अनेक जन्मों से-
उलझते तो नहीं जा रहे हैं ?
करीब आने की धुन में-
दूर तो नहीं जा रहे हैं ?
ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं -
जिनके उत्तर कभी नहीं मिलते ।
इसीलिए दिल के ऑंगन में-
सुरभित- सुन्दर फूल नहीं खिलते ।

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एक पिता

>> Sunday, June 8, 2008

मैंने देखा एक पिता
एक नन्ही बालिका की
मधुर मुस्कान पर
सुध-बुध भूला पिता……
.आँखों से छलकतीस्नेह की गागर
लबालब वात्सल्य छलकाती थी
और बालिका एक किलकारी
अतुल्य दौलत दे जाती थी
क्रूर, कठोर, निर्दय जैसे विशेषण
दयालु, कोमल और बलिदानीमें
ढल गए....
बेटी को देख……
सारे हाव-भाव बदल गए
क्या यह वही पुरूष है
जिसे नारी शोषक और
अत्याचारी समझती है ?
ना ना ना .......
ये तो एक पिता है
जो बेटी को पाकर
निहाल हो गया है
ममता की यह बरसात
जब और आवेग पाती है
पत्नी से भी अधिक प्रेम
बेटी पा जाती है
प्रेम की दौलत बस
बेटी पर बरस जाती है
और प्रेम की अधिकारिणी
प्रेम से वंचित रह जाती है
प्रेमान्ध पिताघरोंदे बनाता है
अपने सारे सपने
बेटी में ही पाता है
पर बेटी के ब्याह पर
बिल्कुल अकेला रह जाता है
पिता और पुत्री का
एक अनोखा ही नाता है

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अनेकता में एकता

>> Wednesday, June 4, 2008


अनेकता में एकता

 मेरे भारत की विशेषता

  यही पाठ पढ़ा-

और यही पढ़ाया

किन्तु प्रत्यक्ष में

 एकता का

कहीं दर्शन ना पाया

 

कभी धर्म के नाम पर

खुले आम घर जले

 मन्दिर मस्ज़िद टूटे

 

 

 लाखों बर्बाद हो गए

, फिर भी हमने…….

धर्म निरपेक्षिता की

डींगे हाँकी….

 

 

प्रान्तीयता के आधार पर

देश के सर्वोच्च पद का निर्धारण

 राष्ट्रीयता के हृदय पर

एक बड़ा आघात

और सारा देश चुप…..

पद का सही उम्मीदवार

अपमान सह गया

और राष्ट्र मूक रह गया

 

 

और आज फिर..

एक ओर……..

प्रान्तीयता की आवाज़

कानों में शीषा डाल रही है

देश के हर नागरिक को

किंकर्तव्य विमूढ़ बना रही है

आशा की किरणें बहुत

क्षीण होती जा रही हैं

और हम गर्व से

राष्ट्रीयता का…..

 राग आलाप रहे हैं

डींगें हाँक रहे हैं


दूसरी ओर……

आरक्षण का राक्षस

अपनी बाँहें फैला रहा है

और सारा देश विवशता से

कैद में कसमसा रहा है

यह आरक्षण की माँग है या

सुरसा का मुँह

जो निरन्तर बढ़ता ही जारहा है

कोई भी आश्वासन

काम नहीं आरहा है।

 

 

भारत माता शर्मिन्दा है

अपनी सन्तान के

 कुकृत्यों पर

उसका अंग-अंग

पीड़ा से कराह रहा है

ना जाने कौन ये

जहर फैला रहा है

कोई भी उपाय

काम नहीं आ रहा है

 

 

 

मेरे देश की आशाओं

देश को यूँ ना जलाओ

माँ के घावों पर

थोड़ा सा मरहम भी लगाओ

 हम एक हैं

फिर से  ये प्रतिग्या दोहराओ

दे दो विश्वास जो

खोता जा रहा है

 

देश के हर कोने से

यही आग्रह और

यही स्वर आरहा है

 

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